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यह काव्य-संग्रह भावनाओं की एक गहन यात्रा है, जहाँ शब्द केवल लिखे नहीं गए, बल्कि जिए गए हैं। सौरभ कुमार की कविताएँ जीवन के उन अनकहे पलों को स्वर देती हैं, जिन्हें हम अक्सर महसूस तो करते हैं, पर व्यक्त नहीं कर पाते।
"मैं यूँ ही मुस्कराता नहीं हूँ,
पर तेरा नाम आने से पहले
लबों पर हँसी खुद ही चली आती है-तो क्या करूँ।
तू ख़यालों में उलझी नहीं है,
पर ख़याल आने से पहले ही
तू उनमें सिमट जाती है-तो क्या करूँ..."
इस संग्रह में प्रेम की कोमलता, भावनाओं की सच्चाई और एक गहरी आत्मीयता का स्पर्श है। सरल भाषा और गहरे भावों से सजी ये कविताएँ पाठक के मन में उतरकर एक अनकहा रिश्ता बना लेती हैं।
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