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सम्भोगशास्त्र केवल शरीर, आकर्षण या यौन-क्रिया पर लिखी गई पुस्तक नहीं है। यह उस विषय के द्वार पर रखा गया एक दीपक है, जिसके बारे में मनुष्य सबसे अधिक जिज्ञासु होता है, पर सबसे कम खुलकर बात करता है।
यदि सम्भोग केवल शरीर का मिलन होता, तो उसके साथ प्रेम, लज्जा, आसक्ति, ईर्ष्या, करुणा, सृजन और आध्यात्मिक खोज जैसी अनुभूतियाँ क्यों जुड़ती है? यह प्रश्न ही इस पुस्तक की यात्रा का आरम्भ है।
इस पुस्तक में लेखक सौम्य मॉर्नस्टार ने सम्भोग को केवल जैविक दृष्टि से नहीं, बल्कि मनोवैज्ञानिक, दार्शनिक, सांस्कृतिक और मानवीय दृष्टिकोणों से समझने का प्रयास किया है। साथ ही, यह पुस्तक पाठक को अपने भीतर झाँकने के लिए भी आमंत्रित करती है-क्योंकि सम्भोग का सबसे गहरा रहस्य केवल शरीर में नहीं, मन और चेतना में भी छिपा रहता है।
यह पुस्तक उपदेश देने के लिए नहीं लिखी गई। इसका उद्देश्य प्रश्न जगाना है। प्रत्येक अध्याय आपको रुककर सोचने के लिए प्रेरित करेगा-क्या हमने इस विषय को वास्तव में समझा है, या केवल सुनी-सुनाई धारणाओं को ही सत्य मान लिया है?
यदि आप ज्ञान की खोज में है, यदि आप वर्जनाओं से परे जाकर समझना चाहते है कि मानव कामना, प्रेम और निकटता का वास्तविक अर्थ क्या हो सकता है, तो सम्भोगशास्त्र आपकी इस यात्रा का एक साथी बन सकता है॥
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