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"कभी-कभी दौड़ मंज़िल तक नहीं जाती, वो हमें वहां ले जाती है, जहां जाकर हम खुद को पहचानते हैं।"
यह किताब सिर्फ लद्दाख की ऊंचाइयों पर नहीं, उस हौंसले की पहाड़ियों पर चढ़ने की कहानी है, जहां हर सांस, हर कदम, नए भरोसे की तरह था।
सुबह की दौड़, गर्मी, ठंडी हवा, थकान और जीत के बीच, यह सफर बताता है कि अनुशासन, जज्बे से बड़ा होता है, और अपने डर को पार करना ही सबसे बड़ी जीत है।
यह कहानी एक मैराथन की नहीं, हर उस इंसान की है जिसने कभी ख़ुद से कहा - "शायद मुझसे नहीं होगा..." और फिर वही कर दिखाया।
अगर तुमने कभी अपने कंफर्ट जोन की दीवार पर पहला कदम रखने से पहले ठिठक कर सोचा है, तो यह किताब तुम्हे वो कदम बढ़ाने की हिम्मत देगी।
"हिम्मत वहीं जन्म लेती है, जहाँ हम अपनी सहज ज़िंदगी गिरवी रख देते हैं, उस सपने के लिए जो हमें हर सुकून से ज़्यादा ज़िंदा रखता है।"
और जब तुम ये किताब बंद करोगे, तब शायद तुम्हे भी महसूस होगा -
"हर रेस, हर सफ़र, आख़िरकार ख़ुद तक लौट आने का ही रास्ता है।"
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